दिल के समंदर में जज्बातों
की गीली रेत पर तुम्हारे नंगे पांव के निशान बनते हैं...वक्त की लहरों में बह भी
जाते हैं..हां उनका एहसास रह जाता है हमेशा की तरह...ये बिल्कुल उसी तरह से है
जैसे मैं मिट्टी के किले बनाता हूं और वो हल्की चोट से ढह जाएं...बारिश की बूंदों
में मुझे इन्हें संभालना पड़ता है... कभी छांव में तो कभी सिर चढ़ती धूप में बैठकर
उनकी मरम्मत करनी होती है.....उनके आस-पास पत्थरों की चारदीवारी भी खींचनी होती
है.. जिससे तुम्हारे पांव के उन निशानों को कुछ ना हो...वैसे ही जैसे खुद बरसात
में भीगते हुए तुम्हें बूंदों से बचाना... या फिर धूप में खड़े होकर छांव की एक
बदली हाथों में कैद कर तुम तक पहुंचाना.....ये बेहद कठिन है......लेकिन कई सालों
में इकट्ठा की हुई कमाई को यूं भी जाया नहीं किया जा सकता। इसे संभालकर रखना होता
है...किसी कोने में...पुरानी पोटली की कई तहों के भीतर... जिसमें झांकने का हक
किसी का ना हो.....इस पोटली से निकले एहसास भी तुम्हारी तरह ही ओल्ड वाइन जैसे
हैं....जितने पुराने होते जाते हैं....उतने ही असरदार....जब ये पोटली खुलती है...
तो तुम्हारी बातों और सांसों दोनों का नशा सिर पर चढ़ जाता है......बाकी सब
धुंधला....सबकी शक्लें धुंधली.... और मेरी अक्ल भी.... एक ही सुरूर बचता है और वो
तुम और तुम्हारे पांव के निशान.......
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